पुरानी शर्ट

रोज  की तरह जब बाथरूम से नहा कर निकला तो सामने एक पुरानी सी शर्ट दिख गयी, मैंने पहन ली।
मगर ये 200 ग्राम की शर्ट मुझे यूं लग रही थी जैसे मैंने कोई लोहे का कवच पहन लिया हो- मैं दबा जा रहा था।
दरअसल ये शर्ट मेरे पापा की थी, और वो बोझ उस कपड़े का नहीं था।
वो‌ बोझ था उन ज़िम्मेदारियों का जिन्हें वो रोज पहनते हैं।
वो चुभन कपड़े की नहीं थी, वो चुभन उन सब परेशानियों का थी जिन्हें वो रोज हंस कर‌ निबाह कर‌ लेते हैं…
हमें पता तक नहीं लगता।
मैं स्तब्ध होकर‌ वहीं बैठ गया और सोचता रहा कोई इंसान सिर्फ हमें बेहतर ज़िंदगी देने के लिए।
हमें ख़ुश रखने के लिए, कितने ग़मों को अपने भीतर समेट सकता है।
ये हुनर शाय़द ज़िंदगी के तजुर्बों से उन्हें आया है कि, हम रोते हैं तो वो मुस्कुरा कर हमें साहस देते हैं।
और ख़ुद दुःखी होने पर इस लिए नहीं रोते, कि हमें दुःख होगा।
शायद इसी लिए उन्हें ईश्वर का दर्ज़ा दिया गया है?
वो मेरे सामने खड़े थे। मन किया उठूं कस के उन्हें भींच कर गले लगा लूं, और कहूंँ “love you papa!”
मगर मेरे अंदर इतना साहस कहांँ?
सो बस उठा शर्ट उतारी, हल्का सा मुस्कुराया, और गर्दन झुका कर चला गया।


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