वोह कमरा

वोह अक्सर मुझसे पूछती है, “कैसे रहते हो इस बंद से कमरे में,

घुटन नहीं होती इस कमरे में?”।

मैं भी मुस्कुरा कर कह देता हूँ की, मैं कहाँ रहता हूँ इस कमरे में।

यहाँ सिर्फ इंतज़ार रहता है,

वोह जो कल का वादा करके गया था,

वही जो मुझे समझा के गया था की मेरा इंतज़ार मत करना।

आज भी उसी का इंतज़ार कर रहा है यह कमरा,

इस उम्मीद में है की न जाने कब वोह आएगा और उसकी खुशबू से महकेगा यह कमरा।

आता हूँ मैं कुछ वक़्त गुज़ारने यहाँ,

कुछ पुराने पल और यादें ताज़ा करने यहाँ।

घड़ी की टिक-टिक बंद हो गयी है ना जाने कबसे रुकी पड़ी है,

इंतज़ार और भी करना है तुम्हारे बिना वक़्त ना जाने कब तक गुज़ारना है।

वोह तुम्हारी शिकायतें याद कर सिगरेट सुलगा लेता हूँ मैं,

वोह अक्सर मुझसे पूछती है,” कैसे रहते हो इस बंद से कमरे में?”।


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Hi! I am Manik Chopra. I am a BCA graduate and presently working as a freelance content writer. I love writing fictional stories and poetries. I might be the writer, But you will always be the words.

Email – manikchopraonline@gmail.com

Instagram – https://www.instagram.com/manikchopra0803


Editors: Mrinali


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One response to “वोह कमरा”

  1. Why u express everything soo well nd i just lovee the way u express everything🤗☀….may god bless u lotss ☀☀☀🕉✌

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